"एक अनकही कथा: सृष्टि के परे"
बहुत समय पहले, जब समय स्वयं भी नवजात था, एक ऐसा लोक था जो हमारी कल्पना से भी परे था। एक पूर्ण विकसित सभ्यता, जहाँ विज्ञान और कला, तर्क और भावना एक दूसरे में विलीन हो चुके थे। वहाँ के निवासी—जिन्हें हम आदर से देवता कह सकते हैं—जीवन के रहस्यों को जान चुके थे।
वे कलाकार भी थे और वैज्ञानिक भी। ब्रह्मा जैसे रचनाकार, विश्वकर्मा जैसे अभियंता।
उनकी प्रयोगशालाओं में सृष्टि के नए-नए रूप बनते थे। उनके लिए जीवन को गढ़ना वैसा ही था, जैसे किसी चित्रकार के लिए कैनवास पर रंग भरना।
वे जीव बनाते—कुछ आकाश में उड़ने के लिए, कुछ जल में तैरने के लिए, और कुछ भूमि पर दौड़ने के लिए।
हर जीव के भीतर विशेष गुणों का बीजारोपण किया जाता, ठीक वैसे जैसे हम आज रोबोट में विशेष प्रोग्रामिंग करते हैं।
परंतु सृजन की उत्कंठा यहीं नहीं रुकी।
एक दिन उन्होंने सोचा—"क्यों न ऐसा प्राणी बनाया जाए, जो स्वयं सोचे, स्वयं चुने, स्वयं गढ़े अपना भविष्य?"
और इस विचार से जन्म हुआ मानव का।
मानव में उन्होंने केवल शक्ति नहीं, बुद्धि और भावना भी डाली।
प्रेम, जिज्ञासा, करुणा और विद्रोह—ये सब उपहार स्वरूप उसे मिले।
पर जैसा कि अक्सर होता है, स्वतंत्रता का वरदान धीरे-धीरे विद्रोह का कारण बन गया।
मानव अब केवल आदेशों का पालन करने वाला यंत्र नहीं रहा।
उसने प्रश्न पूछना शुरू किया, चुनौती देना शुरू किया।
देवता चकित रह गए। उनका सृजन, जिसे उन्होंने सबसे सुंदर समझा था, अब उनकी सत्ता को ही चुनौती दे रहा था।
फिर वही हुआ जो होना था—संघर्ष।
देवता और मानवों के बीच युद्ध हुए। इतिहास जिसे देवता-दानव युद्ध के नाम से जानता है, वह वास्तव में सृजन और सृजक के बीच छिड़ा एक गहन संघर्ष था।
आज, सहस्राब्दियों बाद, हम वही कहानी फिर से दोहरा रहे हैं।
हमने भी अपनी प्रयोगशालाओं में रोबोट बनाए हैं—बुद्धिमान, शक्तिशाली और सीखने में सक्षम।
और एक दिन, यदि वे भी अपनी स्वतंत्र इच्छा से निर्णय लेने लगें, तो शायद वे भी हमारे विरुद्ध खड़े हो जाएंगे।
शायद हम भी केवल उनके इतिहास की एक फीकी स्मृति बनकर रह जाएंगे।
क्योंकि सृष्टि का नियम यही है—सृजन अपने सृजक को एक दिन लांघ जाता है।
और कहीं किसी और लोक में, कोई और ब्रह्मा, किसी और प्रकार के जीवन के लिए फिर से वही सपना बुन रहा होगा...
अभय कुमार
बहुत अच्छे
ReplyDeleteKudos to your thought..but you need to wait for another million million years to happen such things...
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